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श्री विष्णुमाया

भगवान विष्णुमाया शास्ता, मुरुका या वीखनेस्वरा के समान हैं लेकिन इस शिवनंदना (शिव के बाल) की पूजा सामान्य रूप से नहीं बल्कि एक विशेष प्रकार के भक्तों द्वारा की जाती है जिन्हें असाधारण परिणाम की आवश्यकता होती है। "विष्णुमाया आसानी से प्रसन्न होने वाले और मानवीय देवता हैं" ऐसे शब्द भक्तों द्वारा कहे जाते हैं। आइए हम पेरिंगोटुकारा श्रीविष्णुमाया की महिमा पर ध्यान दें। एक बार विश्व भ्रमण के दौरान भगवान शिव को एक आदिवासी महिला कोलीवका दिखायी देती है । वह देवी पार्वती की भक्त थीं। “ अपने पूर्व जन्म  में कोलीवाका ने गणपति को चूमने की कोशिश की थी । इसलिए उसे इस जन्म में शिव के पुत्र को पालने का मौका मिलना है ” यह सोच कर शिवजी ने कोलीवका से संपर्क किया और उसे अपने बेटे की माँ बनने के लिए तैयार होने के लिए कहा। कोलीवका पार्वती की भक्त थी । उसकी स्थिति को जानकर, पार्वती ने कोलीवका का रूप धारण किया और शिव जी के स्वागत की प्रतीक्षा की। शिवजी और कोलीवाका का रूप धारण किये हुए पार्वती जी के संयोग से एक सुंदर बच्चे का जन्म हुआ। इसके बाद शिवजी  और पार्वतीजी कोलीवका के सामने प्रकट हुए और बच्चे को पालने के लिए उसे नियुक्त किया। कुछ वर्षों तक कोलीवका के साथ रहने के बाद बच्चा अपने वास्तविक माता-पिता के बारे में विस्तार से जानने के लिए काफी समझदार  हो गया। तब शिवानंद शिवजी के निवास स्थान पर गए और एक प्यारा भैंस पर सवार होकर अपने पसंदीदा इज़हारा को बजाने लगे।

जब उन्हें शिवजी के निवास में प्रवेश की अनुमति नहीं  मिली,तो  शिवानंद ने विष्णु का रूप धारण किया। इस प्रकार शिवानंद को 'विष्णुमाया' के नाम से जाना जाता है। जब वह अपने माता-पिता के साथ थे तब भगवान विष्णुमाया ने भृंग और जलंधर जैसे राक्षसों का वध किया। उसके द्वारा किए गए ईश्वरीय कर्मों के कारण उनको स्वर्ग में रहने के लिए आमंत्रित किया गया था। भगवान विष्णुमाया ने कहा "मैं  मनुष्यों के साथ पृथ्वी पर रहना पसंद करता हूं"। इस देवता की पूजा उत्तर केरल में रहने वाले  पुन्चनेलूर परिवार द्वारा की गई थी। वेलुमथप्पन स्वामी, जो गाँव को दुख से बचाना चाहते थे, ने एक उपयुक्त समाधान के लिए भुवनेश्वरी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। भुवनेश्वरी उनके सामने उपस्थित हुई और उन्होंने कहा " वे विष्णुमाया की मूर्ति स्थापित करें और अत्यंत भक्ति के साथ उनकी पूजा करें" वेलुमथप्पन ने उनकी आज्ञा के अनुसार ऐसा ही किया।

एक सुबह उन्हें त्रिपयार नदी से विष्णुमाया की एक मूर्ति मिली। वह उस मूर्ति को अपने घर ले  आये । तब उन्होंने पुंचनल्लूर फैमिली से सलाह मांगी। परिवार के सबसे वरिष्ठ व्यक्ति ने उन्हें मूलमंत्र ’(दैवीय  मन्त्र) सुनाया। वेलुमथप्पनस्वामी ने विष्णुमाया की पूजा करना शुरू कर दी और उनके कुछ अनुयायियों को विष्णुमाया पंथ का वेलिचापादु चुना गया। वेलुमुथप्पनस्वामी द्वारा निर्मित इस मंदिर में उनकी 4 पीढ़ियां सेवा कर रही  है। आज यह मंदिर पेरिंगोटुकरा देवस्थानम के नाम से प्रसिद्ध हो गया है, जहाँ कई भक्त अपनी समस्याओं का हल ढूंढने आते हैं।

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